अधूरा इश्क़ !!!

http://tomcarter.co.uk/archive/2016/04/ diary-journal-person-water-writing-Favim.com-185639

order provigil from india बड़े लम्बे अरसे  बाद आज फिर डायरी खोली। अजी आज बस मन किआ तोह सोचा की कुछ लिख लिए जाए। एक  अरसा हो गया डायरी खोले और कुछ लिखे हुए। बस  फिर क्या था।  उठायी  पास पड़ी  चाय की प्याली, एक लम्बी चुस्की ली सुुुुद्द्द्द्द्द्। …  और शुरू हो गए लिखना।  जैसे ही कलम खोली और लिखना शुरू किआ , न जाने क्या हुआ की शब्द ही नहीं उतरे कागज पर और हमेश की तरह बहुत देर तक डायरी को ताकते रहे और आधे घंटे के बाद झुंझला कर डायरी बंद कर दी यह फुसफुसा कर की ये कलम अब बूढी हो चली है , कल नयी कलम लाएंगे और फिर वही पुरानी तरह गज़ब का लिखेंगे की सब वाह वाह करते रह जायेंगे।

http://sclarita.com/author/mike/?ak_action=reject_mobile हम जैसे ही कलम को कलमदान में रखने ही वाले थे की हमे कुछ आवाज़ सुनाई दी।  इधर   उधर देखा पर कोई दिखा नहीं , लगा की मन का वहम है।  पर फिर से वही सुनाई दिए स्सह्ह्ह सस्श्ह्ह्ह।  गौर फ़रमाया तोह देखा की यह आवाज़ तोह हमारे कमलदान से आ रही है।

अच्छा, तोह ये माजरा है।  हम कुछ लिख नहीं पा रहे तोह अब यह भी हमारा मजाक उदा रही है।

voltaren gel 50 mg pret अभी बताते है इस कलमुही को तोह।  हम गुस्से से लाल पीले हो रहे थे की इतने में हमारी कलम बोल पड़ी , ” स्सह्ह्ह्  स्श्ह्ह्ह् ”

क्या है, काहे इतना आवाज़ कर रही हो ? तनिक शांत नहीं बैठ सकती क्या जैसे दूसरे कलम बैठे है।”हम तमतमाते हुए बोले।

कलम ने एक हलकी सी मुस्कराहट दी और अपने वही पुराने शांत और गुड  जैसे मीठे लहज़े में बोली , “जनाब मुझ पर काहे गुस्सा होते है।  मेरा क्या कसूर।  आप लिख नहीं पा रहे तोह मैं क्या करू।  सारा कसूर आपका ही तोह है।

हमारा क्या कसूर ? तुमको पता नहीं है की हम लेखक है।  और कभी कभी लेखको को राइटिंग ब्लॉक हो जाता है।  तुम नहीं समझोगी।  इतना कह कर हमने अपनी आराम कुर्सी सरकाई और आँख बंद कर बैठ गए आराम करने।  अभी आँख लगी भी नहीं थी की ये कमबख्त कलम फिर से बोल पड़ी।

“जनाब , सुनो न “.

क्या है ? तुम चुप क्यों नहीं होती हो ?

“मैं तोह चुप ही रहती हूँ , तुम ही चुप नहीं रहते।  अरे जनाब कभी अपने भीतर तोह नज़र डालिये कभी।  कभी पूछिये तोह अपने इस दिल से की क्यों नहीं लिख पाते आप कभी उस डायरी में ? क्यों उसे खोलते ही उसे देखते रहते हैं और एकटक नज़रो से ताकने के बाद उसे बंद कर  देते है यह बोल कर की मैं   बूढी हो चली हूँ।”

“हाँ, तोह क्या गलत कहा हमने।  हमने अपनी आँखे खोलते हुए और तेज आवाज़ में कहा। ”

कलम ने फिर अपनी नज़रे हमारी ओर घुमायी और  व्यंग्य भरी  हसी हस्ते हुए कहा , ” कभी देखा है अपने भीतर झाँक कर ? क्या चलता है वहाँ ? कब तलक इस तूफ़ान को अपने अंदर दबाये रखोगे जनाब ? कब तक नहीं कहोगे किसी से ? इतने बरस हो गए है उसे गए और तुम आज तक उसके जाने का गम अपने अंदर दबाये बैठे हो। क्यों नहीं निकालते अपने इस तूफ़ान को अपनी डायरी में।  जनाब, 5 बरस हो गए है मुझे तुम्हारे साथ रहते हुए।  और पिछले 1 महीने से तुम रोज शाम को अपनी डायरी खोलते हो , उसे ताकते हो और बंद कर देते हो।

सब जानती  हूँ  , कोई तुम्हारा वो क्या बोलते हो तुम , “रीटीई बाललल ” जो तुम बड़े लोग बोलते हो , वो बीमारी नहीं है तुम्हे।  तुम्हे तोह इश्क़ वाली बिमारी है।  आज तक उसके इश्क़ के रंग में रंगे  हुए हो।  उसकी वो बातें , वो हसी , उसका चंचलपन  कचोटता है तुम्हे अंदर से।  याद है न क्या कहा था उसने तुमसे ? ऐसे क्या देख रहे हो जनाब ? तुम्हारे इश्क़ की साक्षी हूँ मैं।  मेरे सामने ही तोह दी थी  उसने यह डायरी तुम्हे और बड़े प्यार से कहा था की जब भी इस डायरी को  खोलोगे तोह उसकी तस्वीर तुम्हे दिखेगी।  याद है या भूल गए।  नहीं, नहीं।  भूल तोह नहीं सकते तुम।

अरे इशकज़ादे , कभी तोह उस डायरी के पन्नो पर गौर फ़रमा  और देख तेरे ही आंसू छपे पड़े है हर एक पन्ने  पर और वही आंसू तुझे लिखने नहीं देते।

मत समेट इस समुन्दर को अपने सीने में , बर्बाद कर जाएगा यह तुझे एक दिन और कही का नहीं छोड़ेगा।  मान ले मेरी बात और। ……

बस।  अब एक अलफ़ाज़  और नहीं।  बहुत बोल ली तुम।  अब हमे एक शब्द नहीं सुन्ना है तुहारे से।  चुप चाप बैठी रहो अपनी जगह दुसरो की तरह वरना निकाल बहार फेंक देंगे।“ इतना कह कर हम झट से अपनी आराम कुर्सी से उठे और उस कलम को अलमारी के अंदर की दराज में रख दिए।

और रजाई लेकर अपने बिस्तर में सो गए। सो तोह गए पर नींद तोह न जाने कौनसे कोने में दुबक गयी थी जो ससुरी आ ही नहीं रही थी।  बस अगर कुछ आ रहा था तोह वो उस कलमुही कलम की आवाज़।  बहुत समय बाद किसी ने दिल को सच्चाई से रूबरू जो कराया था।  खैर, कुछ गलत भी तोह नहीं कहा उसने।  इश्क़ है ही वो कीड़ा जो किसी को काट जाए तोह जिंदगी भर घाव ठीक नहीं होता।  पर हमारा तोह माजरा ही अलग है।  हम तोह बहुत प्यार से रहते थे बस इ ससुरी किस्मत है न।  न जाने कौनसा खेल खेलती है जो अलग कर दिए उसे हमसे ठीक उसई तरह जिस तरह अमीर बाप अपनी बेटी को एक साधारण लड़के से प्यार हो जाने पर सभी हथकंडे  अपना कर साम दाम दंड भेद से  उसे अलग कर ही देता है दोनों को और अधूरी रह जाती है उनकी प्रेम कहानी जैसी तुम्हारी और मेरी रही। हमारा अधूरा इश्क़ …!!!

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